अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद
सुधीर ज़िंदे
शोधार्थी
पीएच.डी. अनुवाद प्रौद्योगिकी
अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद में एक प्रतीक
व्यवस्था में दिये गए पाठ को दूसरी प्रतीक व्यवस्था में अंतरित किया जाता है। अंत:
भाषिक अनुवाद और अंतरभाषिक अनुवाद से इसकी तुलना करें तो अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद
में अनुवादक को न केवल भाषिक प्रतिकों से जूझना पड़ता है बल्कि भाषेतर प्रतीक
व्यवस्था से भी जूझना पड़ता है। और नाइडा की अनुवाद की परिभाषा के अनुसार स्त्रोत
भाषा की प्रतीक व्यवस्था में निहित अर्थ का अंतरण लक्ष्य भाषा की प्रतीक व्यवस्था
में अनुवाद कराते समय किया जाता है तब उन दोनों प्रतीक व्यवस्थाओं के बीच अर्थ के
अंतरण की प्रक्रिया का अध्ययन विश्लेषण आवश्यक हो जाता है। इसे एक उदाहरण के रूप
में समझे – जब कोई उपन्यासकर अपने उपन्यास में राम के किरदार को बताते हुये लिखता
है कि ‘राम बीमार था’। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से हम इसे एक
लिखित ध्वनि प्रतिकों की व्यवस्था मानते है जिसका एक विशिष्ट अर्थ है। इस वाक्य का
जब रूपांतरण किसी फिल्म के दृश्य में किया जाता है त एक वाक्य के लिए कई भाषेतर
प्रतिकों का प्रयोग उस वाक्य में निहित अर्थ को फिल्म के माध्यम से संप्रेषित करने
का प्रयास किया जाता है। यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है। शब्द(lexical) अर्थविज्ञान शब्द में निहित अर्थ के संदर्भ में यह कहता है कि किसी शब्द
को पढ़ते ही पाठक उसमें निहित अर्थ को जीतने प्रतिशत ग्रहण करता है उसी के आधार पर
उसे दूसरे संप्रेषन के माध्यमों से संप्रेषित करता है,जैसे
कल्पना करें किसी व्यक्ति के सर पर पूरे बाल है। इसक अर्थ है कि वह गंजा नहीं है।
अब हम धीरे धीरे एक एक बाल उसके सर से अलग
करें तो इस प्रक्रिया में एक समय वह गंजा हो जाएगा। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान
यह बताना असंभव होगा कि किस विशिष्ट बिंदु पर वह व्यक्ति एक आम बालों वाले इंसान
से गंजा हो गया है। अर्थात अगर शब्द के स्तर पर किसी शब्द का अर्थ ग्रहण न कर पाने
पर दूसरी प्रतीक व्यवस्था में उसे उसी रूप में संप्रेषित कर पाना कठिन हो जाता है।
मोनेको
के अनुसार, ‘novel leaves
much room for imagination, but in film for example the novel’s word ‘rose’ can
bring to mind different kinds of roses, but in film spectators all see one
specific rose from a specific angle’. अर्थात यह शब्द से
प्रोक्ति तक भाषा के सभी स्तरों पर होता है। Dinda L. Gorlee के अनुसार, ‘informational loss’ must be highest intersemiotic translation in which
the semiosis shows maximum degeneracy (and hence maximum generacy) and it must
be lowest in intralingual translation, where the simiosis shows maximum
generacy (and hence minimum degeneracy). अर्थात
अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद में सृजनात्मक की संभावना अन्य अनुवाद प्रकारों की अपेक्षा
अधिक होती है लेकिन साथ ही स्त्रोत भाषा में निहित सूचना के पूर्ण अंतरण की
संभावना कम होती है। संकेत विज्ञान और अनुवाद संबंध स्थापित करते हुये prnzio कहते है, “where there are signs, or, better, where there are semiotics processes
there is translation”. तथा अनुवाद में संकेत विज्ञान की
भूमिका को बताते हुये Torop कहते है ‘translation has an inherently intersemiotic character’.
1. सस्यूर
के भाषिक प्रतीक सिद्धांत जिसमें प्रतिकों की प्रकृति जैसे प्रतिमापरक (iconic) प्रतीक संकेतपरक (indexical) प्रतीक और सामान्य
प्रतीक (sign proper) के आधार पर प्रतीकांतरण की प्रकृति को
प्रतिकों के अर्थातरण की प्रकृति के आधार पर समझा जा सकता है। इस दृष्टि को ध्यान
में रखकर उपन्यास तथा उसके फिल्म रूपांतरण में प्रयुक्त प्रतिकों का विश्लेषण
अनुवाद की दृष्टि से किया जा सकता है जिसमें प्रतिकों की संरचना से लेकर अरर्थातरण
में उनकी भूमिका को विश्लेषित किया हा सकता है।
2. पियर्स
के प्रतीक सिद्धांत जिसमें पियर्स ने प्रतीक व्यवस्था को sign और interpretant की निरंतर शृंखला के रूप में
विश्लेषित किया है। उनका कहना है कि प्रतीक interpertant स्वयं
एक प्रतीक बनकर दूसरे interpreting के माध्यम से पहले अर्थ
से संबंधित दूसरे अर्थ को स्थापित करता है जिसे सामान्य रूप में समझने की दृष्टि
से हम लक्षणिक अर्थ भी कह सकते है। और फिर यह प्रक्रिया निरंतर अपने अर्थ का अधीक
विस्तार करते हुये चलती रहती है।
इस दृष्टि को ध्यान में रखते हुये फिल्म रूपांतरण
में उपन्यास में प्रयुक्त प्रतिकों को प्रतीक और इंटरप्रिटंट की इस श्रुंखला में
कहा और किस तरह से स्थापित किया गया है इसका विश्लेषण किया जा सकता है।
3. फिल्म
रूपांतरण की प्रक्रिया में निहित प्रतीकांतरण की प्रक्रिया के लिए आवश्यक सामान्य
नियमों (अंतरप्रतिकात्मक अनुवाद व्याकरण) का पता लगाना तथा उन नियमों का विश्लेषण
करना जिससे भविष्य में फिल्म रूपांतरण के लिए प्रयुक्त किया जा सके।
भाषा
व्यक्ति के विचारों को अभिव्यक्त करने का साधन है। विचारों की अभिव्यक्ति के रूप
में यदि भाषा को हम देखें तो भाषा की परिभाषा मानव समाज तक ही सीमित न रहकर
मानवेतर प्राणी जीवन की सांकेतिक भाषा को भी अपने में समाहित करती है। एक प्राणी
होने के नाते मनुष्य भी मौखिक संप्रेषण के साथ साथ कायिक संकेत के माध्यम से
संप्रेषण स्थापित करता है। लेकिन अन्य प्राणियों के मुक़ाबले मानव अपनी कायिक
चेष्टा तथा भावभंगिमा के प्रति कम सचेत रहता है। 1950 में अलबर्ट महरेबियन द्वारा
कायिक भाषा पर किए गए एक शोध के अनुसार किसी भी मानव भाषिक संप्रेषण में 7 प्रतिशत
संदेश वहन शाब्दिक और 38 प्रतिशत संदेश का वहन ध्वनि के सुर तान से होता है जबकि
55 प्रतिशत संदेश का वहन अशाब्दिक या कायिक भाव भंगिमाओं के माध्यम से होता है।
इसलिए
इस तरह के सांकेतिक संप्रेषण के निर्वचन में संकेत प्रणाली तथा संकेतों के आपसी
संबंध का ज्ञान आवश्यक होता है।
सस्यूर
ने भाषिक संप्रेषण व्यवस्था को प्रतीक के माध्यम से रखा। उन्होने प्रतीक को ‘कथ्य’(signified) और
अभिव्यक्ति (signifier) के संबंधों के रूप में देखा। उन्होने
प्रतीक को कथ्य और अभिव्यक्ति के पक्षों से जुड़ी एक संश्लिष्ट और सार्थक इकाई माना
है। प्रसिद्ध विद्वान पियर्स के अनुसार “A sign is something that stands
to somebody for something else in some respect or capacity.” उदाहरण
के लिए हम कह सकते है कि शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक हैं क्योंकि
व्याख्याता(भक्तों) के लिए शिवलिंग वह वस्तु है जो अन्य वस्तु (भगवान शिव) के लिए
कुछ विशेष संदर्भों में प्रयुक्त होता है। प्रतीक की अवधारणा त्रिवर्गीय संकेतन
संबंधों पर आधारित है – ‘संकेतन वस्तु’, ‘संकेतार्थ’, और ‘संकेत प्रतीक’। संकेतक वस्तु बाह्य जगत में स्थित
इकाई है – यथा घोडा, किताब आदि। ‘संकेतार्थ’ व्याख्याता प्रयोगकर्ता के मन में स्थित उस इकाई की संकल्पना है। प्रतीक
इस संकेतार्थ को अभिव्यक्ति देनेवाली इकाई है जो संकेतार्थ वस्तु के स्थान पर कुछ
विशेष संदर्भों में प्रयुक्त होती है।
प्राणी
जीवन पर आधारित वृत्तचित्रों के निर्वचन में प्रकृति और प्राणियों के बीच आपसी
संबंधों में निहित संकेतों के आधार पर निर्वचन किया जाता है। इस प्रक्रिया में वृत्तचित्रों
में दिखाये गए प्राणियों के बीच घटित बायोसेमिओसिस तथा प्रकृति में हो रहे निरंतर
बदलाव के प्रति कायिक प्रतिक्रिया के आधार पर निर्वचक करता है। लेकिन निर्वचन करते
समय एक महत्वपूर्ण बात यह कि प्रतिकों की इस व्यवस्था को निर्वचन को अपने श्रोता
तक इस तरह से संप्रेषित करना होता है जिसे श्रोता उसे पूर्ण रूप से ग्रहण कर सके।
निर्वचन के इस पक्ष में श्रोता के सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का भी खयाल रखा
जाता है जिस तरह से साहित्यिक अनुवाद की प्रक्रिया में होता है। निर्वचन की इस
प्रक्रिया में प्रतिकों के बीच यादृचिक संबंधों के आधार पर श्रोता के लिए जानबूझकर
उस तरह का निर्वचन किया जाता है ताकि श्रोता की स्वीकार्यता बनी रहे। निर्वचन की
इस प्रक्रिया का आधार वह संकेत प्रणाली होती हैं जिसके माध्यम से सही अर्थ तक
पहुचने का प्रयास किया जाता है। लेकिन प्राणियों के बीच स्थापित इस संप्रेषन को
किसी मानव समाज तक निर्वचन करते समय निर्वचक को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता
है। इसका प्रमुख कारण प्राणियों की सांकेतिक भाषा का मानव भाषा में निर्वचन है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव भाषा संप्रेषन का साधन मात्र न होकर समाज और
संस्कृति का आईना होती है। इस दृष्टिकोण से प्राणियों की जीवन पद्धति तथा प्रकृति
के साथ उनकी प्रतिक्रीया का मानव समाज और संस्कृति के साथ निर्वचन के माध्यम से
मेल बैठा पाना कठिन होता है। इसलिए उचित एवं स्वीकारनीय निर्वचन एक चुनौती पूर्ण
कार्य है।
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