Monday, February 9, 2015



                                  पी-एच॰डी॰अनुवाद प्रौद्योगिकी हेतु रूपरेखा (Synopsis)
                                                 शोध-विषय
                                  वर्‍हाडी बोली के लोकगीतों का संकलन और हिंदी अनुवाद
                                                 शोधार्थी
                                   विद्या दिलीपराव चंदनखेड

प्रस्तावना
वर्‍हाडी बोली मराठी भाषा कि एक प्रमुख बोली है।  जो प्रमुख रूप से विदर्भ के ग्रामिण क्षेत्रों  में बोली जाती है। इस बोली का भाषाई क्षेत्र बुलढाणा जिले के पूर्वीय भाग से वर्‍हाडी बोली से ताप्ती नदी तक फैला है और वहाँ से पूर्व की तरफ एलिचपुर, बैतुल, छिंदवाड़ा, शिवनी, बालाघाट आदि का दक्षिण भाग वर्‍हाडी बोली में आता है। वर्‍हाडी बोली प्रमुख रूप से बुलढाणा,अकोला, वाशिम, और वर्धा के पश्चिम भाग तक बोली जाती है। परंपरा से जाने के कारण इसे वर्‍हाडी नाम पड़ा । जार्ज गिर्यसन द्वारा किए गए सवेक्षण में इस बोली को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है”। वर्‍हाडी  और मध्य प्रांत के दक्षिण क्षेत्र विस्तृत है।  इस बोली के प्रांत जाति आदि के आधार पर विभाजित करने बावजूद प्रमुख रूप से  इसके मुख्य 2 प्रकार माने गए हैं ।
1)घाट के ऊपर की  वर्‍हाडी
2) घाट के नीचे की  वर्‍हाडी
                वर्‍हाडी बोली को प्राचीन माना गया है। इसका ठोस दावा प्रस्तुत करते हुए लीलाचरित्र गोविंद प्रभुचरित्र आदि आद्य महानुभावीय ग्रंथिक भाषाओं में इसको दर्शाते हुए डॉ॰ सु॰ डोलके ने कहा-सारांश वर्‍हाडी मराठी से अंशत: प्राचीन एवं आद्य मराठी से व्याकरण मान्यता से दूर, ऐसी महाराष्ट्र की प्रमुख बोली है”। वर्‍हाडी बोली का उद्गम महाराष्ट्रि में है। विदर्भ को ही पहले महाराष्ट्र कहते थे। आर्य जब भारत में आए तब उन्होने  अपनी पहली बस्ती दक्षिण दिशा में स्थापित की थी और वे जिस भाषा में बात करते थे उस भाषा को प्रांत परत्वेमराठी भाषा कहते है और वो संस्कृत से विकसित प्राकृत भाषा हैं। इस संदर्भ में डॉ॰ य॰ पू॰ देशपांडे कहते है कि –जब आर्य दक्षिणपंथ आए थे और वहाँ  जो भाषा बोलते थे वही अभी कि जो मराठी भाषा में उसका मूल है। वेदों के भाषा में ऐसे कुछ शब्द हैं  जो साहित्यिक संस्कृत में नहीं है। तथापि वे शब्द विदर्भ कि मराठी भाषा में दिखाई देते हैं।
  कुछ समय के बाद द्रविड़ भाषा का संपर्क बढ़ जाने के कारण महाराष्ट्री अपभ्रष्ट होने लगी। महाराष्ट्री अप्रभंश का उदय ओ गया वही मराठी भाषा कि साक्षात जननी है। ऐसा श्री॰ वा॰ ना॰ देशपांडे कहते हैं। इस उदाहरण से स्पष्ट है। कि महाराष्ट्र विदर्भ का ही दूसरा नाम है और मराठी कि उत्पत्ति  विदर्भ से ही ऐसा अनुमान है। वर्‍हाडी बोली मराठी कि एक बोली हैं। आज मानक मराठी माँ है और उसकी बोलियाँ उसकी बेटियाँ है। लेकिन अतीत में देखा जाए तो मराठी में जितनी आद्य ग्रंथ को देखे तो उसकी भाषा वर्‍हाडी बोली ही हैं। इसीलिए मराठी भाषा का साहित्य कितना भी बड़ा हो व्यापक हो लेकिन उसकी गंगोत्री वर्‍हाडी बोली है।     
महाराष्ट्र की स्थापना 1 मई 1960 में की गई। भारत की तरह महाराष्ट्र भी विविधता के सजा हुआ है। अनेक प्रकार की जाति समुदाय,विभिन्न संस्कृति और विभिन्न जीवनशैली के कारण महाराष्ट्र मराठी के अनेक रूप को उस भाग की बोली कहते है। महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत में वर्‍हाडीबोली जाती है। इसी वर्‍हाडी बोली के लोकगीतों का संकलन और अनुवादमेरे शोध कार्य का विषय है।
 परिकल्पना
वर्‍हाडी बोली विदर्भ प्रांत में बोली जानेवाली एसी बोली है। जिसमें अनेक लोकसाहित्य, नाटक, कविताएँ , चक्कीपर गानेवाले गीत देखने को मिलते, लेकिन इस बोली का आजतक अनुवाद नहीं हुआ है। इसीलिए मैंने इसी वर्‍हाडी बोली के लोकगीतों का अनुवाद विषय को चुना है।
जैसे -                                        वर्‍हाडी गीत
लहानपणचा उपकारं  माहया शिरी
माहया मातनं न्हाणलं  पायावरी ॥
बापाचा उपकारं । फिटेन आल्या गेल्या
मायचा उपकारं । फिटेना काही केल्या ॥
मायले मानीनं मायं चुलतीले  मानीनं गंगा
दयाळा पांडुरंगा । मोती भरं माया भांगा ॥
अनुवाद
बचपन से मेरे सरपर है उपकार
मैया ने मेरी नहाया पैरोपर
पिताजी का उपकार । चूकेगा कभी
माताजी का उपकार । न चूकेगा कभी
माँ को मानूँगी माई । चाची को मानूँगी गंगा
हे दयावान पांडुरंगा । मेरे मांग मे भर सिंधुर
2)                                             वर्‍हाडी गीत
1)    सासुरवासच्या। बांधीन पुडया
येन बावाजी। सांगीन थोड्या थोड्या
2) सासुरवासचे। भरले गोठान
येईन बावाजी। मंग सांगीन वाटेन
हिंदी अनुवाद
ससुराल की प्रताड़नओ की बांध कर रखूंगी गठठडीया
आएंगे पिताजी तो बताऊँगी  धीरे धीरे।
ससुराल की प्रताड़नाओं का भर गया अब गोठा।
                                       
  
                             शोध की समस्या
विदर्भ प्रांत में बोली जाने वाली वर्‍हाडी बोली जो प्रमुख रूप से विदर्भ के ग्रामीण क्षेत्र में बोली जाती है । इस बोली  में अनेक लोकनाट्य, लोकसाहित्य, चक्की पर गाने वाले गीत दिखाई देते हैं, लेकिन आज तक इनका अनुवाद नहीं हुआ । जिसमें मैंने चक्की पर गाने वाले गीतों का विषय चयन किया है । इसलिए मैंने वर्‍हाडी बोली के लोकगीतों का संकलन और हिंदी अनुवाद चुना है ।

                                  उद्देश्य
प्रस्तुत शोध प्रबंध का मुख्य उद्देश्य वर्‍हाडी बोली का हिंदी भाषा में अनुवादपरक विश्लेषण करना ।
¡ वर्‍हाडी बोली को अवगत कराना ।
¡ वर्‍हाडी बोली के संस्कृति को अवगत कराना ।
¡ वर्‍हाडी बोली के संस्कृति को हिंदी भाषाई लोगों से ज्ञात करवाना ।
महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत में प्रयुक्त की जाने वाली वर्‍हाडी बोली के भाषाई क्षेत्र को दर्शाना ।

                        शोध का क्षेत्र
इस शोध का क्षेत्र महाराष्ट्र के अंतर्गत आने वाला विदर्भ प्रांत तक सीमित रहेगा।

    


साहित्य पुनरावलोकन
प्रस्तुत विषय पर शोधार्थी संज्ञान में कोई महत्वपूर्ण काम नहीं हुआ है । इस विषय में परिचयात्मक जानकारी निम्नलिखित मिलती है ।
1) खोड़े डॉ ॰ ह ॰ स्त्रियांची गाथानिऋत्ती प्रकाशन वर्धा (2014)
       खोड़े ने स्त्रियांची गाथाइस किताब में विदर्भ क्षेत्र के ग्रामीण भाग में चक्की पर गाने वाले गीतों के बारे में लिखा है । इस भारतीय समाज जीवन के अनेक आयाम देखने को मिलते हैं।
 2-वाघ विट्ठल काया मातीत मातीतजंगम आफ़सेट प्रकाशन पुणे (2007)
विट्ठल वाघ ने इस किताब से वरहदी बोली के गीतों का वर्णन किया है । इन गीतों में वरहदी लोगों की भावनाओं के बारे में बताया गया है । जैसे अखलीले जारे तुम्ही माहा । वावर पंढरी हाले भलाच्या पानात झेंडी इटोबची खरी 

3- प्राचीन विदर्भ व आजचे नागपुरअमरावती विद्यापीठ प्रकाशन
इस किताब में विदर्भ के इतिहास के बारे में चर्चा की है जिसमें
विदर्भ नाम और वरहदी बोली कैसे आया है । इसका वर्णन किया है। 
जिसमें, लोकोक्तियाँ, कहावते और मुहावरे दिये हैं ।
4- सोटे  दे॰ ग॰ नागपुरी बोलीसाइट साहित्य प्रकाशन वर्धा (1974)
इस किताब में सोते ने वैदर्भि बोली के बारे में बताया वर्‍हाडी बोली के चक्कीपर गाने वाले गीत

                          शोध प्रविधि
शोध में प्रविधि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि प्रविधि के आधार पर ही शोधार्थी वैज्ञानिक पद्धति से निष्कर्ष तक पहुँच पाता है । प्रस्तुत शोध प्रबंध में एक से ज्यादा प्रविधियों को अपनाया जाएगा । इस शोध में मुख्य रूप से तुलनात्मक और सर्वेक्षण प्रविधि का उपयोग किया जाएगा। जिसके लिए प्राथमिक और द्वितीय प्रकार का तथ्य संकलन किया गया जाएगा
                            अध्याय विन्यास
प्रथम अध्याय –मराठी भाषा और उसकी बोलियाँ
द्वितीय अध्याय – वर्‍हाडी बोली का सामान्य परिचय और लोकतात्विक पक्ष
तृतीय अध्याय – वर्‍हाडी बोली का काव्यशास्त्रीय पक्ष
चतुर्थ अध्याय - वर्‍हाडी बोली के विविध गीत
अध्याय पांच – वर्‍हाडी बोली के गीतों का अनुवाद

संदर्भ और सूची
¡ खोड़े, डॉ ॰ ह॰ ‘गंगासागर’  निऋत्ती प्रकाशन वर्धा (2014)
¡ वाघ, विट्ठल काया मातीत मातीतजंगम आफ़सेट प्रकाशन पुणे (2007)
¡ प्राचीन विदर्भ व आजचे नागपुरअमरावती विद्यापीठ प्रकाशन
¡ खोड़े, डॉ ॰ ह ॰ स्त्रियांची गाथानिऋत्ती प्रकाशन वर्धा (2014)
¡ सोटे , दे॰ ग॰ नागपुरी बोलीसाइट साहित्य प्रकाशन वर्धा (1974)
¡ गोस्वामी, कृष्ण कुमार ‘अनुवाद विज्ञानं की भूमिका’ राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली (२००8)
¡ वाटाने, डॉ॰ राजेंद्र ॰ वैदर्भीय काव्यधाराविजय प्रकाशन नागपुर ,(2011)
शोधार्थी
                                                           विद्या दिलीपराव चंदनखेडे
                                                          पी॰एच॰डी॰अनुवाद प्रौद्योगिकी
                                                           सत्र- 2013-14

                                                                    Email :vidyachandankhede@gmail.com 
                                                                    संपर्क-604468107

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