Tuesday, February 10, 2015

हैमलेट के अनुवाद का समीक्षात्मक परिचय

हैमलेट के अनुवाद का समीक्षात्मक परिचय
                                    शावेज ख़ान

जी॰बी हैरिसन शेक्सपियर के संदर्भ में कहते हैं कि
No household in the English-speaking world is properly furnished unless it contains copies of the Holy Bible and of The Works Of William Shakespeare. It is not always thought necessary that these books should be read in mature years, but they must be present as symbols of Religion and Culture.
इन पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शेक्सपियर का स्थान अंग्रेज़ी विश्व में किस रूप में ग्रहण किया जाता है। वहां उनकी कृतियों को वही आदर और सम्मान मिलता है जो की पवित्र ग्रंथ बाइबल को दिया जाता है और एक घर तब तक सम्पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसमें पवित्र ग्रंथ बाइबल और शेक्सपियर की रचनाएँ उपस्थित न हो भले ही इन कृतियों को पढ़ा न जाए किंतु यह धर्म और संस्कृति के रूप में प्रत्येक घर में अवश्य होनी चाहिए ऐसी श्रद्धा शेक्सपियर हेतु हमें पाश्चात्य समाज में देखने को मिलती है।

विश्व- साहित्य के अद्वितीय नाटककार शेक्सपियर का जन्म 26 अप्रैल, 1564 ई॰ में स्ट्रेटफोर्ड-आन-एवोन नामक स्थान में हुआ। इनके पिता का नाम जॉन शेक्सपियर और माता का नाम मैरी शेक्सपियर था। 1587 ई॰ में शेक्सपियर ने लंदन जाकर नाटक कंपनियों में काम करना शुरू किया जहां से उनकी कला धीरे-धीरे समूचे विश्व में अपना वर्चस्व स्थापित कर गई। शेक्सपियर ने 1612 ई॰ में लिखना छोड़ दिया और 1616 ई॰ में उनका देहांत हो गया और विश्व-साहित्य का पर्याय हमेशा के लिए अलविदा कह गया।
शेक्सपियर ने लगभग-लगभग 36 नाटक लिखे और कुछ कविताएं भी लिखीं। उनके कुछ प्रसिद्ध नाटक हैं- जूलियस सीज़र, ओथेलो, मैकबेथ, हैमलेट, सम्राट लियर, रोमियो जूलियट(दु:खांत), मर्चेन्ट ऑफ वेनिस(वेनिस का सौदागर), ट्वेल्फ्थ नाइट(बारहवीं रात), मच अड़ो अबाउट नथिङ्ग(तिल का ताड़), दी टेम्पेस्ट(तूफ़ान)। इनकी सभी रचनाएँ सुप्रसिद्ध हैं जिनको किसी के परिचय की आवश्यकता नहीं है। शेक्सपियर के द्वारा लिखी गई सब त्रासदियाँ अपने आप में एक मील का पत्थर हैं और उनके समान इस क्षेत्र में फिर दुबारा कोई ख्याति प्राप्त ना कर सका। शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद भारतीय साहित्य में कई साहित्यकारों द्वारा किए गए हैं जिस में कुछ जो सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं वह वो अनुवाद हैं जो डॉ॰हरिवंशराय बच्चन, डॉ॰रांगेय राघव और डॉ॰ अमृत राय द्वारा किए गए।
इन तीनों के प्रयासों में सबसे सफल प्रयास यदि देखा जाए तो वह डॉ॰ रांगेय राघव जी का माना जाता है क्योंकि इनके द्वारा किए गए अनुवाद भाषा की सरलता को बनाए रखते हुए पाठक के मस्तिष्क में वही बिम्ब स्थापित करते हैं जो एक मूल रचना को पढ़ने के बाद पाठक अनुकलित करता है जबकि बच्चन जी का अनुवाद काव्यात्मक होने के कारण बहुत से स्थानों पर कुछ कृत्रिम और कुछ भोड़ा सा प्रतीत होता है। यद्यपि उनका काव्यात्मक प्रयास प्रथम प्रयास होने के कारण सराहनीय है। वहीं अमृत राय जी ने भी गद्यात्मक अनुवाद प्रस्तुत किए परंतु उनकी भाषा में भी वह सहज प्रभाव लक्षित नहीं होता जो रांगेय राघव जी द्वारा अनूदित कृतियाँ सहज भाव से कर जाती हैं।
२०वीं शताब्दी के एक महत्वपूर्ण साहित्यकार डॉ॰ रांगेय राघव जी का जन्म उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध ताजनगरी आगरा में १७ जनवरी १९२३ को हुआ। इनका पूरा नाम तिरुमल्ला नंबकम विराराघवन आचार्य था। इन्होने अपने ४० साल के छोटे से जीवन में १३ वर्ष की आयु से ही लिखना शुरू कर दिया था। ४० साल की आयु में ही कैंसर के कारण इनकी मृत्यु हो गई और एक बहुत बड़ा अनुवादक हमारे बीच न रहा। इनके द्वारा किए गए शेक्सपियर के अनुवाद हैं जूलियस सीज़र, ओथेलो, जैसा तुम चाहो(As you like it), तिल का ताड़(Much Ado About Nothing), तूफ़ान(The Tempest), निष्फल प्रेम, परिवर्तन, बारहवीं रात(Twelfth Night), मैकबेथ, वेनिस का सौदागर(Merchant Of Venice), हैमलेट। 

हैमलेट शेक्सपियर का एक अत्यंत दु:खांत नाटक है। यह नाटक उसके रचनाकाल के तीसरे युग की रचना है, जब उसने जूलियस सीज़र, ओथेलो, सम्राट लियर, मैकबेथ, एंटणी एंड क्लियोपैट्रा केरियोलैनेस, टाइमन ऑफ एथेंस नामक नाटक लिखे थे। ऐसा माना जाता है कि हैमलेट की कथा शेक्सपियर के हैमलेट से पूर्व ही लिखी जा चुकी थी। सैक्सोग्रैमैटिक्स की हिस्टोरीय डैविका में यह पेरिस में 1514 ई॰ में छपी थी। कुछ का मत यह भी है कि अंग्रेज़ी में ही हैमलेट नाटक एक पुराना नाटक था जो शेक्सपियर के हैमलेट से पहले खेला जाता था। कुछ विद्वानों का मत है कि शेक्सपियर ने वहाँ से ही अपने नाटक का कथ्य लिया था।
शेक्सपियर का हैमलेट प्रतिहिंसा का दु:खमय अंत नहीं, मानव-आत्मा का दु:खांत है, जिसमें मनुष्य के उदात्ततम गुण संसार की नीचता और कुटिलता से कुचले जाते हैं। मनुष्य जीवन के जो सार्वजनीन सत्य हैमलेट में प्रतिपादित हैं, वैसे अन्यत्र कम ही मिलते हैं। शेक्सपियर का कोई भी नाटक उसके पाठकों पर वह प्रभाव नहीं डाल सका जो प्रभाव हैमलेट ने डाला। इसका नाम विचारों की त्रासदी रखा गया जो की इसके अनुसार बिलकुल ठीक बैठता है। हैमलेट एक ऐसी त्रासदी है जिसमें इसका मुख्य पात्र हैमलेट” निरंतर धोखे खाने के बाद अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। वह उस स्थिति में फंस जाता है जहां वह केवल अपने एक मित्र को छोड़कर किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकता और जिन पर वह विश्वास करता है वह भी विश्वासघात कर बैठते हैं। इन सब घटनाओं के परिणामस्वरूप वह अपने आपको पागल दर्शाना आरंभ कर देता है ताकि वह सत्य को सामने ला सके। हैमलेट में बहुत से पात्र हैं जिनके नाम रांगेय राघव जी ने उनके मूल रूप में ही रखे हैं ताकि मौलिकता खंडित न हो और यह अनुवाद के नियमों के अनुसार ठीक भी है।
1.  क्लौडियस
डेनमार्क का सम्राट हैमलेट का चाचा और उसके पिता का खूनी (नाटक का मुख्य खलनायक)
2.  हैमलेट
स्वर्गीय सम्राट का पुत्र तथा क्लौडियस का भतीजा(नाटक का मुख्य पात्र)
3.  पोलोनियस
राजमहल का प्रधान करमचारी और क्लौडियस का चाटुकार ओफीलिया और लेआर्टस का पिता।
4.  लेआर्टस
5.  होरेशिओ
हैमलेट का मित्र
6.  गरट्रयूड
डेनमार्क की सम्राज्ञी और हमलेट की माँ
7.  ओफीलिया
हैमलेट की प्रेमिका जिसे वह प्राप्त नहीं कर पाता

यह कुछ मुख्य पात्र हैं जिनके इर्द गिर्द पूरा कथानक कसा गया है
हैमलेट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नाटक नाटक के भीतर एक नाटक है A play within a play। हैमलेट जिसे सब पागल समझते हैं वस्तुतः वह केवल एक ढोंग करता हुआ पूरे नाटक में नज़र आता है जिसे सभी उसका पागलपन समझते हैं किंतु उसका अभिनय इतना वास्तविक होता है कि वह उसके उद्देश्य को पूरा कर ही देता है। हैमलेट जिसे बहुत से विद्वानों ने कायर, डरपोक, कमजोर व्यक्ति की उपाधी दी वह उतना ही चतुर और उद्देश्यलक्षित पुरुष था। कुछ विद्वानों ने हैमलेट के मानसिक-विश्लेषण पर काफी बल दिया जिसमें डॉ॰ एर्न्स्ट जोन्स जी का यह विचार था की हैमलेट ने अपने प्रतिशोध को टाला क्यों; क्या वह सच में पागल था या सिर्फ पागल होने का ढोंग करता था। हैमलेट ने एक कलात्मक अभिनय की उपलब्धि को सम्पन्न किया या निष्पन्न किया। डॉ॰ जोन्स ने अपने यह विचार विभिन्न विद्वानों के मतों के विश्लेषण के पश्चात दुनिया के सामने रखे। अलरिसी ने सन १८३९ में यह विचार सामने रखा की हैमलेट मूल रूप से यह जानता ही नहीं था की प्रतिशोध का नैतिक औचित्य है क्या। उसकी चरित्रगत प्रवृति और बहुत अधिक समर्पित धार्मिक और इसाईयत वाले सिद्धान्त उसको उसके पिता के प्रतिशोध लेने में बाधा बनकर खड़े थे। एक अन्य विद्वान स्टॉल  के अनुसार उसका यह आचरण केवल उसके बौद्धिक होने से संबन्धित था और वह बहुत कटु यथार्थवादी था जो की उसके

पिता के प्रेत पर किसी हालत में विश्वास करने के लिए राज़ी नहीं था और उस प्रेत की संधिग्त्ता ही उसे प्रतिशोध को लेकर दुविधा में डाले थी। वह स्वयं को विश्वास नहीं दिला पा रहा था की प्रेत पर विश्वास किया जाए या नहीं। क्या कारण है की हैमलेट अकेले में किए गए आकाशभाष में अपनी विवशता तो दर्शाता है किंतु उसके दिमाग में क्या चल रहा है खुल के नहीं बताता। उसकी इस दुविधा के निष्कर्ष स्वरूप यही कहा जा सकता है की हैमलेट के अंदर किसी प्रकार की घृणा थी अपने पिता के प्रतिशोध को लेकर जिसे वह स्वयं नहीं पहचान सकता था। हैमलेट के अंदर एक शिशु था जिसे समय की मार ने समय से पहले ही वयस्क बना दिया था और साथ ही उसके पिता को उससे छीन कर अनाथ भी।   उसे जबरन चतुर बनना पड़ा किंतु वह यह ज़िम्मेदारी ढंग से अपने कंधों पर ले ना पाया जिसके कारण वह भयभीत हो उठा। बहादुर वो होता है जिसने जीवन भर जीवन से संघर्ष किया होता है और वो संघर्ष जो दूसरों के साथ किया जाता है किंतु हैमलेट तो इस सब के लिए बना ही नहीं था और जिस घर में ही गला काटने वाला साथ रहे वहाँ भय न होगा तो क्या होगा। यह भय एक समय के बाद उसकी कमजोरी बन गया जो की एक ऐसी घृणा में परिवर्तित हो गई जिसे वह अंत तक स्वयं ही नहीं समझ सका।
हैमलेट जो की १७वीं शताब्दी(१६००-१६०२) के आरंभ में लिखा गया, शेक्सपियर का ऐसा नाटक है जिस पर बहुत से निर्वचनों ने भी जन्म लिया। यह नाटक निर्वचन की दृष्टि से एक ऐसा नाटक है जिस पर यदि चर्चा की जाए तो शायद ही उसका कोई अंत देखने को मिले। साथ ही साथ यह बहुत से रहस्यों को भी उद्घाटित करता है जो की नाटक के बीच ही देखने को मिलते हैं। यहाँ एक रहस्य को मूल नाटक और अनूदित कृति की पंक्तियों के द्वारा समझाने का प्रयास किया जा रहा है-
Act Five, Scene One
FIRST CLOWN : Give me leave; here lies the water; good: here stands the man; it is will he nill he, he goes; mark you that? but if the water come to him and drown him, he drowns not himself. Argal, he that is not guilty of his own death, shortens not his own life.
अनुवाद
पहला विदूषक : नहीं, पहले मेरी बात पूरी हो जाने दो साथी! देखो मानो यहाँ तो पानी है। बहुत अच्छा, और यहाँ आदमी खड़ा है, बहुत अच्छा। अब अगर आदमी पानी के पास जाए और अपने-आपको उसमें डुबो दे, तो इसका मतलब हुआ कि उसने यह काम अपनी इच्छा से किया है। समझे, इस बात को अपनी ध्यान में रखना, लेकिन अगर उसके जाने के बजाय पानी ही स्वयं उसके पास आ जाए और उसे डुबा दे, तो यह उसकी आत्महत्या नहीं होगी। इसका यह तात्पर्य हुआ कि अगर मनुष्य अपनी इच्छा से अपनी हत्या नहीं करता है तो उस पर यह दोष नहीं लगाया जा सकता कि उसने किसी तरह आत्महत्या की है। समझे?
इन पंक्तियों में हो रहे रहस्य के उदघाटन को साफ-साफ देखा जा सकता है यह संवाद उस समय का है जब पहला विदूषक दूसरे विदूषक को ओफीलिया की कब्र खोदते समय उसकी आत्महत्या के संदर्भ में समझा रहा था। उसके शब्द इस तथ्य को सोचने पर विवश कर देते हैं कि ओफीलिया की मृत्यु आत्महत्या थी या वह एक हत्या थी। यदि इसे एक साज़िश कहा जाए तो यह षड्यंत्र किसने रचा था? केवल एक ही व्यक्ति था जिसे ओफीलिया की मृत्यु से कोई लाभ हो सकता था और वह था सम्राट। नाटक में जिस तत्व को दर्शाया नहीं गया वह यही था ओफीलिया की मृत्यु उसके भाई को और अधिक प्रतिशोध के लिए उक्साएगी और वह अपने पिता और अपनी बहन का बदला हैमलेट से लेकर ही रहेगा। यह षड्यंत्र केवल सम्राट का ही हो सकता है जिससे यह सिद्ध हो जाता है की ओफीलिया की मृत्यु आत्महत्या नहीं हत्या थी। दूसरी ओर इन पंक्तियों से निर्वचन का भी बोध होता है क्योंकि ओफीलिया की मृत्यु समसामायिक स्तिथियों का ही परिणाम थी जो उसकी आत्महत्या को एक हत्या के रूप में परिवर्तित करती है।
हैमलेट शेक्सपियर की एक ऐसी रचना है जो पाठक एवं दर्शक दोनों को ही संसार की उन घिनौनी वास्तविकताओं से परिचित करती हैं जो ऊपर से तो नहीं दिखती हैं किंतु अंदर ही अंदर मनुष्य को खोखला करती चली जाती हैं। हैमलेट भी ऐसी ही स्थिति का शिकार हुआ एक पात्र है। शेक्सपियर की त्रासदियों का तोड़ तो नहीं है किंतु उनकी रचनाओं में एक बात जो बार-बार किसी न किसी रूप में उभर कर सामने आती है वह है उनकी स्त्री के विरुद्ध लक्षित होने वाली विचार धारा। उनके द्वारा लिखे गए हर नाटक में कहीं न कहीं स्त्री ही मुख्य पात्र के सर्वनाश का कारण बनती है जैसे ओथेलो के सर्वनाश का कारण डेसडिमोना’, मैकबेथ की मृत्यु का कारण लेडी मैकबेथ’, हैमलेट के सर्वनाश का कारण गरट्रयूड उसकी माँ और उसकी प्रेमिका आदि। उनकी स्त्री को लेकर इस विचारधारा पर पहले भी कई चर्चाएँ हो चुकी हैं किंतु इसके पीछे लिप्त विचारधारा को कोई समझ न पाया है। हैमलेट में भी उनके द्वारा एक पंक्ति इस संदर्भ में मिलती है-


Frailty, thy name is women”(Act one, Scene two)
 Means frailty, your second name is women.
अर्थात
Frailty शब्द के कई पर्याय हैं जैसे दोष, निर्बलता, अस्थिरता, भंगुरता आदि किंतु यहाँ इस शब्द को अस्थिरता के रूप में ग्रहण किया गया है क्योंकि हैमलेट की माँ उसके पिता की मृत्यु के पश्चात तुरंत ही उसके चाचा के साथ दूसरा विवाह कर लेती है जिससे हैमलेट को बहुत बड़ा धक्का लगता है कहीं न कहीं इस शब्द को निर्बलता के रूप में भी रखा गया है यदि उसकी माँ की दृष्टि से सोचा जाए तो।

अंत में निष्कर्ष स्वरूप हम यह ही कह सकते हैं की शेक्सपियर की एक-एक कृति अपने भीतर ना जाने क्या-क्या छिपाए हुए है और उनकी भाषा भी अत्यधिक कठिन है एक हिंदी भाषा भाषी के लिए किंतु रांगेय राघव जी द्वारा किया गया हैमलेट का अनुवाद कुछ अपवादों को छोड़कर अनुवाद की कसौटी पर खरा उतरता है यह सरल है, सुग्राह्य है, मूल रचना के बहुत अधिक समीप है, इसमें स्वतंत्रता भी अधिक नहीं ली गई है, भावानुवाद पर विशेष बल दिया गया है, शब्दों के सटीक समतुल्य चुने गए हैं, मूल रचनाकर की कृति को मौलिक सी गति प्रदान की गई है और यह अनूदित कृति पाठक पर मूल कृति की भांति समान प्रभाव डालती नज़र आती है। राघव जी इस प्रकार के नाटकों का अनुवाद केवल एक से दो दिन में कर दिया करते थे वह कौशल यहाँ नज़र भी आता है किंतु क्योंकि जल्दी का काम शैतान का काम होता है तो कुछ त्रुटियाँ भी कहीं कहीं दिखाई देती हैं किंतु इतने अच्छे अनुवाद में उन्हें नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। इस नाटक के अनुवाद के माध्यम से इसे अब हिंदी में भी खेला जा सकता है और यह रंगमंचीयता की दृष्टि से भी रचना के साथ पूरा न्याय करता है क्योंकि इसे बड़ी सरलता से रंगमंच पर खेला जा सकता है। यह एक काव्यात्मक कृति का गद्यात्मक अनुवाद होते हुए भी अपनी संप्रेषणीयता कहीं नहीं खोता और यह एक उत्तम गद्यानुवाद का सर्वोच्च उदाहरण है। आज जिस प्रकार अनुवाद का विस्तार हो रहा है उस प्रकार इस विषय को लेकर लोग जागरूक नहीं हैं किंतु यदि डॉ॰ रांगेय राघव जी जैसी दृष्टि रखकर अनुवाद के विद्यार्थी अनुवाद करने का प्रयास करें तो साहित्यिक अनुवाद के क्षेत्र में भी परचम लहराया जा सकता है। हैमलेट का अनुवाद एक सफल अनुवाद है और यह साधारण पाठक तक शेक्सपियर को  मूल नाटक के रूप में ही पहुंचता है। यह तथ्य यह अनुवाद स्वयं ही सिद्ध कर चुका है और इसे किसी प्रकार के प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।



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