मारुति
कार
मूल गुजराती कहानी : @डॉ.कन्हैयालाल भट्ट
हिंदी अनुवाद : @लतिका चावड़ा
पी-एच.डी. शोधार्थी,
अनुवाद प्रौद्योगिकी विभाग | संपर्क :7620613859 | 8624854728
मारुति कार
दरवाज़े पर आकर खड़ी हुई, जनकराय आश्चर्य में पड़ गए | जिस घर के द्वार पर कभी सायकल
की घंटी तक बज नहीं सकी उस घर कर द्वार पर मारुति कार?
उन्होंने चारपाई पर बैठे-बैठे
झट से धोती ठीक की | कंधे से गमछा उतारकर बगल में रखा | खाखी बीड़ी बुझा दी | झट से
एक नज़र सामने वाले आईने पर डाली, चेहरा वृद्ध लगा | लेकिन भरावदार होने पर मन ही
मन खुश हुए, पास में रखा चश्मा उठाकर आँखों पर लगाया | आँखें जगमगा उठीं | दृष्टि
घर के दरवाज़े से बाहर मारुति कार के दरवाज़े पर पहुँची |
जशोदा ने अपनी बावन वर्ष
की ज़िन्दगी में कभी असली मारुति कार नहीं देखि थी | एक बार उसे स्वप्न में आया था
कि वह और उसके पति जनकराय दोनों मारुति कार में कहीं दूर-दूर जा रहे हैं | सुबह
होते ही वो स्वप्न जशोदा ने अपने पति को बताया | उस सुबह पति पत्नी दोनों ने ही
मानो काल्पनिक सुखों के घोड़ों की रेस लगा दी थी |
उसके दो
दिन बाद ही जनकराय के सीने में दर्द उठा था, जशोदा को उनके सीने का दर्द याद आ गया
| तवे पर भाखरी जली | धुंआ निकला, बास आई, भाखरी पर काले दाग पड़ गए | जशोदा ने
झटपट दोनों हाथों से भाखरी घुमाई |
जशोदा को
खुद की ज़िन्दगी भी जली हुई भाखरी सी लगी | एक गहरी बद्दुआ मुँह से निकल गई |
आँटेवाले
हाथ झटके | मोटर का आवाज सुनकर थोड़ी ऊँची हुई तब जशोदा ने खिड़की के बाहर नज़र डाली
तो एक झटका-सा महसूस किया |
उसके घर के दरवाज़े पर
मोटर आई ?
पलभर के
लिए तो जशोदा को अपना स्वप्न सच्चा लगा | उसे लगा शायद ये मोटर उसकी अपनी ही हो तो
?
नहीं,
नहीं, वह तो खुद जानती थी कि उसके पति एक फैक्ट्री में सामान्य क्लर्क की नौकरी
करते थे, इसलिए सायकल भी न ले सके थे | तीन-तीन बेटियों के विवाह का खर्च और ब्याज
पर उठाए पैसों का हर महीने लगने वाले ब्याज के कारण मुश्किल से गुजारा चलता था |
जशोदा ने
खिड़की के बाहर देखा और पटे पर बैठ गई | बाजरे के आँटे में पानी उंडेला | दोनों से
आँटा गूँथा, मसले हुए आँटे के लोइयों को हाथ में लेकर बेलना शुरू किया | आँटे की
गोल लोई फैलती चली गई, बेलने की वह आवाजें तालबद्ध होती गईं... टप... टप... टप...
जनकराय
को जशोदा के हाथों की बनी भाखरी की लयबद्ध टप-टप बहुत अच्छी लगती | 35-35 वर्ष के
प्रसन्न दाम्पत्य जीवन का सुमधुर संगीत इन भाखरी के और हाथों की टप-टप की आवाज से
प्रकट होने का अहसास होता |
उन्होंने
एक नज़र रसोईघर की ओर दौड़ाई |रसोईघर के दरवाज़े से बाहर निकलते धुएँ को स्पर्श करके
वापस आई |
धुआँ,
धुआँ.......;
यह
कंबख्त धुआँ जशोदा की रोज़ मुसीबत करता है | उसकी सुन्दर आँखों के आसपास इस धुएँ ने
गहरे रंग के घेरे रच दिए थे, लेकिन क्या करे ?
परिस्थिति के रचे गहरे घेरों से खुद भी बाहर नहीं निकल पा रहा था | घर में
अशोक स्टव था पर केरोसीन मिलता नहीं, मिलता तो काले बाज़ार से तीन चार गुना भाव पर
लेना महंगा पड़ता | कई बरस बीत गए उन्होंने केरोसीन देखे हुए | घर में चूल्हा और
अंगीठी थे | कोयले और उपले भी बनाती और कुछ पाँच-दस रूपए बचा लिया करती |
जशोदा
ने सिकी हुई भाखरी को उतारकर बेली हुई भाखरी को तवे पर डाला | पास पड़ी पानी की
तश्तरी में हाथ साफ़ किये | किनारे पर पड़े लकड़ी के दो-चार टुकड़े उठाकर चूल्हे में
डाले | लगातार आठ-दस फूँक मारी | आँखों से आँसू निकल आए | विवाह उपरान्त ज़िन्दगी
के 35 बरस यही धुआँ निकालने में चले गए ऐसा उसे लगा |उसमे बेचारे पति जनकराय का
क्या दोष ? जो भी दोष हो वो तो भाग्य का है | नसीब का है | बीते जन्मों के कर्मों
का है | जशोदा को ‘गीता’ का एक श्लोक याद आया |
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा
कर्मफलहेतुर्भूमां ते संग अस्तु अकर्मणि ||”
यह श्लोक उसके पति को
अत्यंत प्रिय था | हररोज़ सुबह स्नान करते वक्त, अचूक जनकराय के मुख से यह श्लोक
सुनने को मिलता |
अपने विवाह
के दुसरे ही दिन सुबह सुअभ जब जनकराय ने स्नान करते वक्त यह श्लोक गाया तब उसने उस
श्लोक का अर्थ पूछा तब जवाब में जनकराय ने सरस्वति चन्द्र जैसा लम्बा व्याख्यान दे
दिया था |
तवे पर
जशोदा ने भाखरी घुमाई | जशोदा को अपने विवाह की याद आई | पहली मधुरजनी याद आई |
बावन बरस के वृद्ध चेहरे पर शर्म के दो छोर फूट पड़े | आँखों से टपकती बूंदों को
साड़ी के आँचल से धीरे-से जशोदा ने पोंछ लिया |
खारे
पानी की दो-चार बूँदें नीचे टपकीं | तभी ऊपर से चूल्हे की राख से धुआँ झगड़ पड़ा |
35 बरस
पहले के जवान जनकराय जशोदा के मानसपटल पर उभर आए | ‘केसरी रंग का अधोवस्त्र, उसपर
सफ़ेद सिल्क का कुर्ता, तेल डालकर बनाए हुए बाल, माथे पर लाल रंग का तिलक, उसपर
केसरी साफ़ा, पैरों में राजस्थानी मोजड़ी, उस वक्त भी जशोदा को जनकराय पुरानी
फिल्मों के हीरो की तरह स्मार्ट लगते |
जशोदा
ने भाखरी तवे से नीचे उतारी |
जनकराय
को लगा यह मारुति उनकी खुद की ही हो तो ? जशोदा को उसमे बिठाकर चार-धाम की यात्रा
कराने ले जाऊँगा | परन्तु.... नहीं, नहीं इस तरह इच्छाओं को क्यों विस्तार देना
चाहिए? इच्छाएँ ही मानव को दुखी करती हैं | प्रसन्न मन में उद्वेग भर देती हैं |
‘गीते’ के 17वें अध्याय का एक श्लोक जनकराय को याद आ गया |
मन:
प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: |
भावसंशुद्धिरित्येततपो मानसमुच्यते ||
इतना होने
पर भी जनकराय मन को काबू में न कर सके | हमारा बीटा जरूर एक दिन मारुति कार लाएगा
और मेरी इच्छा पूरी करेगा | क्षण भर तो जनकराय को लगा की आँगन में खड़ी मारुति कार
से उसका ही पुत्र तो नहीं उतरा ?
उत्सव |
तीन
बेटियों के बाद की संतान, वह पुत्र ‘उत्सव’ था, उत्सव की परवरिश गरीबी में हुई |
उसके कोई भी शौक पूरे न हो सके इस बात का रंज आज भी किसी अन्य पिता की तरह जनकराय
को दुखी कर देता, कॉलेज की पढ़ाई भी खुद उत्सव बड़ी ही मुश्किल से पूरी कर पाया था,
यह जनकराय जानते थे | अंग्रेज़ी माध्यम से ग्रेजुएट उत्सव उच्च अध्ययन भी न कर सका
कि वह प्रोफेसर बन सके | प्रोफेसर बनकर मारुति कार लाने का सपना भी अब उत्सव पूरा
नहीं कर पाएगा | जनकराय के मन में बड़ी भारी उदासी छा गई |
सारे
विछारों कोई झटककर जनकराय ने अपनी दृष्टि दरवाज़े पर स्थिर की | शायद मोटर में उत्सव ही हो |
वहीँ
दरवाज़े से उत्सव अंदर आया |
अरे बीटा
उत्सव ! उस मोटर में तू आया ?
कौन-सी मोटर पिताजी ?
यही
मारुति, जो दरवाज़े पर खड़ी है, वही ?
उत्सव
ने दरवाज़े पर नज़र डाली, कोई मारुति नहीं थी |
वह समझ
गया |
अरे
बाबूजी, आपको कितनी बार कहा है कि आप, ‘मोटर, मोटर’ मत किया करो |
बंद करो
अब मारुति का सपना देखना | ईश्वर ने हमारे नसीब में मारुति कार का सुख
नहीं
लिखा होगा |
‘पर बेटा,
तू आया वह गाड़ी?’
‘मैं पैदल चलकर ही आया हूँ
और बाहर कोई गाड़ी नहीं खड़ी है |’
जैसे ही
जशोदा रसोईघर से बाहर निकली, जनकराय बोल उठे,
‘तूने
बाहर मारुति कार देखि थी कि नहीं?’
‘हाँ,
बीटा उत्सव, गाडी तो मैंने भी देखि थी | किसकी थी वह ? तूने ली बेटा ? अच्छा हुआ |
तेरे पिताजी का सपना कितने बरसों बाद पूरा होगा|
उत्सव हकबका
गया | उसे डॉक्टर के बोल आयद आ गए |
‘यदि तेरे पिताजी का मानसिक भ्रम दूर नहीं हुआ तो उसका असर
तुम्हारी माँ पर पड़ेगा और शायद उन्हें भी मानसिक रोग....’
‘बेटा, हम सब गाड़ी में बैठकर.....’
नहीं माँ, वहाँ कोई गाड़ी नहीं है.... बाबूजी की तरह आप
भी....
उत्सव आगे कुछ न कह सका | उसकी आँखें भीग आईं |
उत्सव |
पिछले कितने समय से चिंतातुर था |
उसके पिता
जनकराय जो अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक सायकल भी न ले पाए थे वे पिछले कई बरसों से
मारुतिकार का सपना संजोए जे रहे हैं |उत्सव को अच्छी तरह से याद था कि जब वह
एम.एस.सी. में था, तब उसने पिताजी से मोटर लेने की बात छेड़ी थी और उसी समय ‘माँ’
ने पिताजी के सीने में दर्द होने की बात समझाई थी, तब से लेकर आज तक उसने कभी भी
मोटर लेने की बात मुँह से नहीं निकाली थी |लेकिन मन के किसी कोने में उत्सव ने भी
एक दिन मारुति कार लेने की इच्छा जगाए रखी थी और न जाने कैसे जब से जनकराय
रिटायर्ड हुए हैं तभी से मारुति कार खरीदने की सोच रहे हैं |आज उन्हें रिटायर्ड
हुए भी बरसों बीत गए | फैक्ट्री से छुट्टी पाई तब पी.एफ. और बीमा तथा थोड़े बहुत
बचत के जो कुछ भी पैसे आए सारे बहनों के दहेज में चले गए, उत्सव यह अच्छी तरह
जानता था |
पिछले 5-7 बरसों से रोज
एकाध बार तो कनकराय को अपने घर के द्वार पर मारुति कार आकर खड़ी होती दिख ही जाती
थी और उस मारुति को देखकर रोज़ जनकराय ठीक हो जाते | विचारों के चक्कर में पड़ जाते
|आखिर में जशोदा को बुलाकर, पास बिठाकर दरवाज़े पर खड़ी मारुति कार बताय करते |
जशोदा भी
बेचारी क्या करे ?
जिंदगी के
इतने बरस गरीबी में निकाले फिर भी यदि गरीबी घर की चौखट न छोड़ती हो, तो एकाध
मारुति कार लेने का सुखद स्वप्न देख लेने की इच्छा को जशोदा कैसे रोक पाती ? फिर
तो जनकराय रोज़ जशोदा को दरवाज़े पर खड़ी मारुति कार दिखाया करते | जशोदा रोज़ यूँ ही
रोटी छोड़कर आ जाया करती | मोटर देखती, हँसती | दोनों पति-पत्नी चारपाई पर बैठकर
मोटर लेकर कहाँ-कहाँ यात्रा करने जाएंगे उसकी चर्चा करते | तीनों बेटियों के घे
जाकर उन्हें भी मोटर में बिठा घूमने ले जाने की बातें करते और मन ही मन अकल्पय
आनंद उठाते, और रसोईघर में रोटी जल जाति | अपने अम्मा-बाबूजी के इस मनोवैज्ञानिक
रोजनिशी से उत्सव वाकिफ़ था |
रात हुई |
चूल्हा चौका निपटाकर जशोदा
अपनी चारपाई पर जाकर लेट गयी | दिन भर की थकान से लास्ट होने से चारपाई पर लम्बे
होते ही आँख लग गई |
निद्रादेवी
ने जशोदा को अपने पासों में लपेट लिया परन्तु जनकराय दूसरी चारपाई पर बैठे-बैठे आँखें बंद कर अब भी
विचारों में डूबे थे |
उत्सव |
वह भी अपनी
चारपाई पर लेता पडा तगा | उसे लगा यदि एकाध बार भी गाड़ी किराए से लेकर अपने
माँ-बाप को चार-धाम की लंबी यात्रा करा दे तो, शायद उनकी लक्ष्य-प्राप्ति का यह
सुखद अनुभव उन्हें उनके मानसिक चितभ्रम से मुक्ति दिला सके | लेकिन मारूति कार किराए
की इतनी बड़ी रक़म वह अकेला किस प्रक्जार चुका पाएगा ?
अपनी
आर्थिक स्थिति का अवलोकन करना उत्सव ने छोड़ दिया था | पिता की तरह खुद भी एक बहुत
ही सामान्य फैक्ट्री में नौकरी करके मुश्किल से घर चलाता था |
उत्सव आज
पूरी तरह से टूट चुका था |
उसने अपनी माँ-बाबूजी की चारपाई पर नजर दौड़ाई |
दोनों शायद सो गए थे ऐसा लगा | ‘क्या करना चाहिए?’ अपनी फैक्ट्री में रोज़ नोट के
बंडल गिनते सेठ के ऑफिस में डाका डालूं ? नहीं, नहीं इस बार तनख्वाह से थोड़ी लौटरी
की टिकट ही ले लेता हूँ | शायद नसीब में मारुति कार-1000 हो और लौटरी लग गई तो ?
नहीं, नहीं अब नसीब पर तो....
बैंक में
चोरी करूँ ?
किसी का
खून ? अपहरण, धोखाधड़ी....
विचारों का
ढेर लग गया उत्सव के मन में | गाड़ी कैसे खरीदूं ? उत्सव को अपने माँ-बाप की इच्छा
के स्वप्न का महत्व आज समझा |खुद भी रोज़ चार किलोमीटर चलकर फैक्ट्री जाता |
गर्मियों की चिलचिलाती धुप, सर्दियों की कड़कड़ाती ठंडी या सावन की धुआँधार बारिश |
जो भी हो तपना, ठिठुरना और भीगना उसके फ़र्ज़ में शामिल हो चुका था |
एकाध
मारुति कार हो.. ड्राइवर हो....!!!!
फैक्ट्री
में कार से नीचे उतरता उसका सेठ उत्सव को याद आया | बिना मारुति कार की जिन्दगी
उत्सव को बेकार-सी लगी | डनलप की नरम-नरम सीट हो |अंदर के कांच से बाहर की साड़ी
सृष्टि का दर्शन होता हो और हवा में सरसराते हुए किलोमीटर कटते चले जाएँ, दूर-दूर
तक वृक्षों की हारमालाएँ दौड़ती चली जाएँ, दिन में सूरज और रात में चाँद भी अपनी
मोटर के साथ-साथ दौड़ते हों |
कितना
उत्तम सुख मिले ?
नहीं,
नहीं, मोटर तो लेनी ही होगी |
उसे लगा इसी
पल माँ-बाबूजी को, जगाकर ख दे कि अब मैं, जो भी हो किसी भी तरह से मारुति कार
लूँगा और सब यात्रा पर जाएंगे |
तमान
रात्रि उत्सव के मन में मोटर कार की घरघराहट कौंधती रही | आँखें घिर आईं | चारों
ओर असंख्य मोटरकारों के बीच उसने स्वयं को उपस्थित पाया | सुबह-सुबह पहले प्रहर
में आँखें लगीं |
सुबह हुई |
उत्सव
अभी उठा नहीं था |
जनकराय ने जशोदा से पूछा, ‘उत्सव अभी तक उठा
क्यों नहीं ? उसकी तबियत तो.... ?’
तभी उत्सव ने करवट बदली, धीरे-धीरे आँखें खोलीं | उसने
चारों तरफ देखा | माँ-बाबूजी को देख मुस्कुराया | घर की चारों दीवारों की ओर देखा
| उसे थोडा संदेह हुआ | सामने टँगी घड़ी की ओर निगाह की, अरे दस बज गए हैं ?
ओह,
तभी
मारुति आकर घर कर दरवाज़े पर खड़ी हुई |
जनकराय,
जशोदा और उत्सव की नजरें दरवाज़े आई मारुति कार के दरवाज़े पर टिक गईं |
दरवाज़ा खुला
|
‘सफ़ेद कलर के
सूट और गॉगल्स पहनकर उत्सव मारुति कर से नीचे उतरा |’
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