Wednesday, April 2, 2014

अनुवाद और निर्वचन का अंत:संबंध : संकेतवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य

                                                                              -  मेघा दिलीप आचार्य       

भाषा वैविध्य की स्थिति अनुवाद तथा निर्वचन की जननी है। अनुवाद और निर्वचन दोनों ही एक भाषा से दूसरी भाषा में कथ्य के अंतरण की प्रक्रिया होने के बावजूद भी दोनो में एक मौलिक अंतर है– अनुवाद का संबंध लेखनी से तथा निर्वचन का संबंध वाणी से है। कहने का तात्पर्य यह कि आशुअनुवाद, भाषांतरण, आशुव्याख्या आदि संज्ञाओं से नामित निर्वचन अनुवाद की ही एक विशिष्ट मौखिक प्रक्रिया होते हुए भी इससे कुछ भिन्न प्रतीत होती है।
अनुवाद और निर्वचन के अंत:संबंध के संदर्भ में बात दोनों विधाओं में समानत्व के अन्वेषण की बात होगी। परंतु इनमें समानता की अपेक्षा अंतर पर अधिक ध्यान जाता है। अत: अनुवाद और निर्वचन के अत:संबंध पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार आवश्यक है जिसके लिए दोनों को संकेतविज्ञान के एक भूमि पर उतारकर देखना होगा।  
·       संकेतविज्ञान, अनुवाद तथा निर्वचन की संकल्पना  
अनुवाद तथा निर्वचन मे संकेतविज्ञान की भूमिका की स्थापना हेतु इन तीनों ही संकल्पना पर दृष्टिक्षेप आवश्यक है।
अनुवाद क्या है ?
            अनुवाद कर्म भाषा का सहायक है। सम्प्रेषण के महत्वपूर्ण साधन के रूप मे भाषा प्रतिष्ठित है परंतु दो भिन्न भाषा-भाषियों के बीच सम्प्रेषण मे जब भाषा ही बाधा बन जाए तब अनुवाद भाषा की समस्या को दूर कर सम्प्रेषण की नैरंतर्यता बनाए रखता है। विभिन्न विद्वानों ने अनुवाद को परिभाषित किया है, कैटफर्ड के लिए यह प्रतिस्थापन है, नाइडा व टैबर के लिए पुन:सृष्टी, बर्खुदारोव ने इसे रुपांतरण कहा तो फईदोरोव इसे अभिव्यक्ति कहते है। ए.एच. स्मिथ के शब्दों मे कहे तो,
“अनुवाद करना यथासंभव अधिक से अधिक भाव की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना है।
            वस्तुत: अनुवाद एक जटिलतम कर्म हैं, क्योंकि प्रत्येक भाषा अपनी प्रकृति, परिवेश, संरचना और अर्थ के साथ विकसित होती है । अत: किसी भी भाषा के आशयपरक, अभिव्यक्तिपरक और समाजपरक आयामों को दूसरी भाषा के संगत आयमों मे प्रतिस्थापित करना कोई सरल कार्य नहीं। 
निर्वचन क्या है ?
            निर्वचन  बहुभाषिक स्थिति के परिणामस्वरुप विकसित एक ऐसी तकनिक है जो दो भिन्न भाषिक व्यक्ति या व्यक्तिसमुहों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान  के मौखिक माध्यम के रूप मे स्थापित हो गया है। निर्वचन से तात्पर्य एक भाषा के कथन को दूसरी भाषा में तत्काल मौखिक रूप मे प्रस्तुत करना है।
            निर्वचन की सरलतम परिभाषा बेकर ने दी है। उनके अनुसार “निर्वचन मौखिक वार्ता का मौखिक रुप में अनुवाद है”। निर्वचन की प्रक्रिया वस्तुत: एक भाषा से दूसरी भाषा मे शाब्दिक अर्थ के स्थानांतरण की अपेक्षा तात्पर्यों का अंतरण है। निर्वचन उस क्रिया की ओर संकेत करता है जिसमें एक भाषारूप के समतुल्य दूसरे भाषारूप के माध्यम से संप्रेषण  को सुकर बनाया जाता है। निर्वचक का कार्य स्रोत भाषा के वक्ता द्वारा लक्ष्य भाषा के श्रोताओं के लिए निर्दिष्ट संदेश के प्रत्येक आर्थिय तत्व (शैली और प्रयुक्ति) तथा प्रत्येक तात्पर्य और भाव  को प्रेषित करना है।
इसके मुख्य रूप से दो प्रकार है:
o   तत्काल निर्वचन- वक्ता के कथनों का उसी समय अनुवाद करते जाना तत्काल निर्वचन कहलाता है।
o   क्रमिक निर्वचन- दो व्यक्तियों के परस्पर वार्तालाप का अनुवाद बारी-बारी प्रस्तुत करना क्रमिक निर्वचन कहलता है।
संकेतविज्ञान क्या है?
संकेतविज्ञान सम्प्रेषण का सार्वभौम और सार्वकालिक ज्ञानानुशासन है। एक ज्ञानानुशासन के रूप में  संकेतविज्ञान संकेतों का विश्लेषण या संकेत व्यवस्था के कार्यचालन का अध्ययन है।
ईको संकेतविज्ञान को निम्नानुसार परिभाषित करते है-
“संकेतविज्ञान उस सब से संबद्ध है जिसे संकेत के रूप में देखा जा सकता है।”
(Semiotics is concerned with everything that can be taken as a sign.)
संकेतविज्ञान से तात्पर्य संकेतों और कोड के सामान्य विज्ञान से है। संकेत ही संकेविज्ञान की आधारभूत इकाई है और संकेतविज्ञान संकेत, संकेत व्यवस्था, संकेत प्रक्रिया तथा संकेत प्रकार्य का व्यवस्थित अध्ययन है।
·       अनुवाद और निर्वचन : संकेतविज्ञानिक संदृष्टि
वस्तुत: अनुवाद तथा निर्वचन की प्रक्रिया संकेतो के प्रतिस्थापन की प्रक्रिया है। संकेत वह है जो किसी वस्तु के स्थान पर प्रयुक्त हो कर किसी विशिष्ट अर्थ का निर्धारण करें। संकेत दो प्रकार के है– भाषिक और भाषेतर। सस्यूर भाषिक प्रतीक की संकल्पना को दो अभिन्न तत्वों में प्रस्तुत करते है संकेतक-संकेतित(signifier–signified)। उनके शब्दों में,
 “The sign is the whole that results from the association of the signifier with the signified.”
अर्थात संकेत संकेतक और संकेतित की समन्वित इकाई है जिनमें से एक की अनुपस्थिती में दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती।  सस्यूर के अनुसार भाषिक संकेत अपनी प्रकृति में मूलत: यादृच्छिक एवं रूढिपरक होते हैं और वे उनके भौतिक उपादान या लक्षण से नहीं बल्कि मूल्यों द्वारा सार्थकता पाते है जो भाषा की अपनी व्यवस्था उसे प्रदान करती है। मूल्य ही भाषिक प्रतीकों के प्रकार्यों स्पष्ट करता है। अनुवाद करते समय अनुवादक या निर्वचक को भाषिक प्रतीकों के स्थानपर दूसरी भाषा के भाषिक प्रतीक मात्र रखने नहीं है बल्कि उनके मूल्यों के प्रकार्य को पहचान कर समांतर प्रकार्यपरक मूल्यों में प्रतिस्थापित करना होता है। कहने का तात्पर्य यह कि अनुवाद तथा निर्वचन भाषा आधारित नहीं बल्कि संकेत आधारित है जो स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा के भाषिक और भाषेतर संकेतों अंतरण व्यापार से संबंधित है।
 प्रत्येक लिखित या मौखिक पाठ मूलत: संकेतो से बना होता है । अनुवादक तथा निर्वचक को उस कथित के पिछे के संकेतित को पकडकर लक्षपाठ के समतुल्य संकेतो मे प्रस्तुत करना होता है। इसके लिए अनुवादक तथा निर्वचक को दोनों भाषा के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, भौगोलिक, धार्मिक आदि संदर्भों से परिचित होना आवश्यक है। क्योंकि जैसे कि सस्यूर ने कहा है कि भाषा केवल नाम पद्धति नहीं है। हर भाषा भौतिक और अनुभव संसार को अपने अपने ढंग से व्यवस्थित करती है। अत: यही कारण है कि एक भाषा के संकेत दूसरी भाषा में उसी तरह प्राप्त नहीं होते। उसे समतुल्यता के आधार पर ही प्रतिस्थापित करना होता है।
सी. एस. पर्स संकेत को परिभाषित करते हुए कहते है,
“A sign or representamen is something which stands to somebody for something in some respect or capacity.”
पर्स संकेत की संकल्पना को निम्न त्रिकोणीय संबंध में प्रस्तुत करते है: 
 
                          

संकेत : संकेतार्थ को अभिव्यक्ति देने वाली इकाई,
संकेतित वस्तु: जिसे संकेत संदर्भित करता है, और
संकेतार्थ:  वह कल्पना है जो संकेत को किसी विशेष अर्थ से जोड़ती है।
संकेत-संकेतित वस्तु-संकेतार्थ का यह त्रिकोणीय संबंध परस्पराधारित ऐसी प्रक्रिया है जो किसी विशेष अर्थ का निष्पादन करते है जिसे संकेतन प्रक्रिया कहा गया है। इस प्रक्रिया में संकेतार्थ स्वत: एक संकेत में परिवर्तित हो जाता है और यह क्रम असमाप्य रूप से चलता रहता है। सी. एस. पर्स के लिए संकेतन की प्रक्रिया संकेत के अनुवाद की प्रक्रिया है। उनके अनुसार संकेत तब तक संकेत नहीं कहलाता जब तक  वह अन्य संकेत में परिवर्तित नहीं हो जाता।अर्थात अर्थ ग्रहण की प्रक्रिया वास्तव में संकेत के अन्य संकेत व्यवस्था में अनुवाद की प्रक्रिया है।
“But a sign is not a sign unless it translate into another sign in which it is more fully developed.”
Dinda l. Gorl e पर्स के अनुवाद संबंधी धारणा पर चर्चा करते हुए कहते है,
“For Peirce translation is the same as sign interpretation, and sign interpretation is translation.”
इस दृष्टि से रोमन याकोब्सन ने अपने आलेख On Linguistic Aspect of Translation में भाषिक संकेत के अनुवाद या अर्थांतरण के तीन प्रकारों का निरुपण किया है। अर्थात वे संकेत व्‍यवस्‍था के परिप्रेक्ष्‍य में किसी भाषिक पाठ के अनुवाद या अर्थांतरण को तीन संदर्भों में देखते है जिसमें एक भाषा से उसी भाषा के अन्य संकेतों में, एक भाषा से अन्य भाषा के संकेतों में, एक भाषिक व्यवस्था से भाषेतर संकेत व्यवस्था में अनुवाद किया जाता है।  याकोब्सन द्वारा निरुपित तीनों प्रकार  निम्नानुसार है :
1.      अत:भाषिक अनुवाद (Rewording) एक ही भाषा के भाषिक संकेतों का उसी भाषा के अन्य संकेतों में पुन:कथन है।
2.      अंतरभाषिक अनुवाद या अनुवाद(Translation Proper) भाषिक संकेतो का किसी अन्य भाषा के संकेतों में अर्थांतरण है।
3.      अंतरप्रतीकात्मक अनुवाद या रुपांतरण(Transmutation) भाषिक संकेतो का भाषेतर संकेत व्यवस्था में रुपांतरण है।
याकोब्सोन के अनुसार संकेत का अर्थनिर्धारण वास्तव में उस संकेत का दूसरे संकेत में अनुवाद है जिसमें वह एक अधिक विकसित संकेत होता है। 
Susan Petrilli अपने आलेख Translation, Semiotics and Ideology में अनुवादी विचार प्रक्रिया की धारणा प्रस्तुत करती है और इसे संकेत प्रक्रिया बताती है,
“…. Translative thinking is a semiotic process in which something stand for something else, in which different sign systems are related, in which one sign is fully developed, enriched, criticized, put a distance, placed between inverted commas, parodied or simply imitated, and in any case, interpreted in terms of another sign.”
अत: स्पष्ट है कि मनुष्य के अर्थग्रहण तथा अर्थाभिव्यक्ति संकेतों के अनुवाद की ही प्रक्रिया है।
 रोमन याकोब्सन के मत में संकेतविज्ञान संप्रेषण का विज्ञान है। संप्रेषण मे वक्ता या लेखक संदेश को कोडीकृत करता है, यह संदेश लिखित या मौखिक माध्यम से प्रेषित करता है और श्रोता या पाठक इसके विकोडीकरण द्वारा अर्थ ग्रहण करता है। संप्रेषण की इस प्रक्रिया को अनुवाद तथा निर्वचन की प्रक्रिया पर लागू करें तो हम देखते है कि अनुवादक और निर्वचक जब एक भाषा के संदेश को दूसरी भाषा में ले जाता है तब वास्तव में वह भी इसी प्रक्रिया से गुजरता है जिसमें स्रोत पाठ के कोडीकृत संदेश को विकोडीकृत कर उसका अंतरण लक्ष पाठ के कोडीकृत संदेश मे करता है। अनुवादक तथा निर्वचक विकोडीकरण के इस चरण में निश्चित संदर्भों में कोडीकृत संदेश मे निहित संकेतों को समझकर अर्थ ग्रहण करता है और उसका अंतरण लक्ष्य पाठ के समतुल्य संकेतो में कोडीकृत करता है।
 निर्वचन की प्रक्रिया में भाषिक तथा भाषेतर संकेत सम्मिलित रहते है। निर्वचन के दौरान निर्वचक को वक्ता की भाषा का विषयानुरूप लहजा, आंगिक चेष्टाओं तथा हावभाव आदि भाषेतर संकेतों को भी समझना होता है। अनुवाद के पास जहां सोच-विचार कर अनुवाद करने के लिए समय होता है वहीं निर्वचक को तत्काल ही अनुवाद मौखिक रूप मे प्रस्तुत करना होता है। अनुवादक तथा निर्वचक दोनों के उद्देश्य, कार्यक्षेत्र, साधन भिन्न है। दोनों विधाओं अनुप्रयुक्त और अनिवार्य कौशल भिन्न-भिन्न है फिर भी दोनों का लक्ष्य एक ही है- किसी भाषा के कथ्य को निष्ठापूर्वक और यथासंभव पूर्ण रूप से अन्य भाषा में अभिव्यक्त करना।
निष्कर्षत: कह सकते है कि अनुवाद तथा निर्वचन संकेतों से बने संदेश के अंतरण का क्रिया व्यापार ही है।  अत: अनुवादक और निर्वचक एक भाषा से दूसरी भाषा संदेश के अंतरण में मूलत: एक ही प्रक्रिया का अनुसरण करता है। अनुवादक और निर्वचक दोनो ही एक भाषा से दूसरी भाषा मे संदेश प्रेषित करने वाले माध्यम है। और इस दृष्टि से अनुवाद तथा निर्वचन अंत:संबंधित है।     


संदर्भग्रंथ सूची
1.      अनुवाद विज्ञान की भूमिका, कृष्ण कुमार गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन (2012) दिल्ली।
2.      आशु अनुवाद , डॉ. गरिमा श्रीवास्तव, संजय प्रकशन(2003), दिल्ली।
3.      अनुवाद सिद्धांत की रुपरेखा, डॉ. सुरेश कुमार,वाणी प्रकाशन(2005), दिल्ली।
4.      भाषा विज्ञान सैद्धांतिक चिंतन, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली।
5.      Semiotics - Volume 1, edited by Mark Gottdiener, Karin Boklund Lagopoulou & Alexandros Ph.Logopoulos, Sage Publications, New Delhi .
6.      Semiotics & the Problem of Translation: with the special to the semiotics of Charles S. Peirse, Dinda l. Gorl e
7.      Signs: An Introduction to Semiotics , Thomas sebeok, university of Toronto press,2001
8.      On Linguistic Aspect of Translation, Roman Jakobson
9.      Translation, Semiotics and Ideology, Susan Petrilli


 मेघा दिलीप आचार्य     
पीएच.डी. अनुवाद प्रौद्योगिकी  
अनुवाद प्रौद्योगिकि विभाग
अनुवाद एवं विर्वचन विद्यापीठ                                                                                          
म. गा.अ.हि.वि. वर्धा(महाराष्ट्र) 442005 
ई-मेल: acharyamegha20@gmail.com
 मो: 09923918421

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